महिला क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों की आंखों पर शानदार चश्मे

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आजकल भारतीय महिला क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों की आंखों पर शानदार चश्मे, चमचमाती पोशाक, फ़ाइव स्टार होटल में ठहरने और जीतने पर ढेरों इनाम के अलावा विदेशी लीग में खेलने जैसे अवसर भी हैं. लेकिन पहले ऐसा नही था. अस्सी के दशक में हालात और थे."एक बार टेस्ट मैच के लिए हमें 1000 रूपये मिले थे. यह शायद साल 1986 की बात है." यह कहना है भारत की पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ी संध्या अग्रवाल का.

उस समय संध्या को ये भी समझ नहीं आया कि इसे यादगार मान कर रख लें या खर्च करें. संध्या अग्रवाल ने भारत के लिए 13 टेस्ट और 21 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेले हैं.उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में चार शतकों और इतने ही अर्धशतकों की मदद से 1110 रन बनाए हैं. एकदिवसीय क्रिकेट में उन्होंने चार अर्धशतकों की मदद से 567 रन बनाए.

संध्या ने अपना पहला टेस्ट मैच साल 1984 में अहमदाबाद में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ और अंतिम टेस्ट मैच साल 1995 में कोलकाता में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ खेला.साल 1995 में ही संध्या अग्रवाल ने अपना अंतिम एकदिवसीय मैच भी खेला. लेकिन शायद ही संध्या अग्रवाल ने क्रिकेट की दुनिया में पैसे की चमक-दमक देखी हो.भारतीय महिला क्रिकेट टीम इंग्लैंड में जारी आईसीसी महिला विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट के फ़ाइनल में रविवार को इंग्लैंड से भिड़ रही है.उस पर भारी-भरकम इनामों की बौछार भी होने वाली है. अगर भारतीय टीम चैम्पियन बन गई तो उसके कहने ही क्या, फिर तो ख़ुद बीसीसीआई ही खिलाड़ियों को करोड़ों रुपये दे देगी.

लेकिन संध्या अग्रवाल जैसी ना जाने कितनी पूर्व भारतीय महिला खिलाड़ी हैं जिन्हे अपने बलबूते ही भारतीय क्रिकेट टीम तक का सफ़र तय करना पड़ा.अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए संध्या अग्रवाल ने बीबीसी से कहा, "उस समय पैसे को लेकर बहुत दिक्कत थी. यात्रा करने में परेशानी थी. होटल में ठहरने की सुविधा तो शायद ही कभी मिलती थी. मैदान भी बहुत अच्छी सुविधाओं वाले नहीं थे."उन्होंने कहा, "उन दिनों अब जैसे बेहतरीन विकेट खेलने के लिए नहीं मिलते थे. अब तो हमारी टीम को बीसीसीआई का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उसने अपना सहयोग देकर भारतीय महिला टीम को इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचने में योगदान दिया."संध्या अग्रवाल ने बताया कि वह आज बहुत खुश हैं कि उनके जैसी दूसरी महिला क्रिकेटरों का संघर्ष आज रंग लाया है.

संध्या आगे कहती हैं, "उन दिनों तो विदेशी दौरों तक में कोई मैच फ़ीस नही होती थी. कोई टीए-डीए नहीं होता था. विदेश जाने और वापस आने का पैसा ज़रूर सरकार देती थी. पैसे का सवाल है तो कुछ नहीं मिलता था. वहां जो कुछ खाने-पीने का इंतज़ाम होता था उसी से काम चलाना पड़ता था."उन्होंने कहा, "बाक़ी पैसा हम अपने घर से लेकर जाते थे ताकि उससे अपने खेल को आगे चला सकें."ऐसे में कौन मदद करता था? इस सवाल के जवाब में संध्या अग्रवाल ने बताया, "परिवार का बहुत सहारा मिला. माता-पिता ने हर कदम पर मदद की. उस समय सबकी सहायता केवल परिवार वाले ही करते थे. हमारी कोशिश बस यही थी कि किसी तरह भारत में महिला क्रिकेट ज़िंदा रहे. बाद में एक बैट बनाने वाली मशहूर कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट मिला जिसने बहुत मदद की."

क्या महिला क्रिकेट के दिन बदलेंगे? इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, "यह भी सच है कि हमें तो उम्मीद ही नहीं थी कि महिला क्रिकेट में भी आज जैसे दिन आएंगे. शुक्र है कि इस तरह के दिन आए और हो सकता है कि आने वाले दिनों में भारतीय महिला क्रिकेट का स्वरूप पूरी तरह बदल जाए.वैसे संध्या अग्रवाल भारतीय महिला क्रिकेट में भारतीय रेलवे के योगदान को नही भूलतीं. उनका मानना है कि साल 1985 में जब से रेलवे ने महिला क्रिकेट टीम बनानी शुरू की तब से दिन सुधरे.रेलवे ने तब लगभग सभी महिला क्रिकेटर को नौकरी दी. शायद इसी वजह से भारत में महिला क्रिकेट बची रह सकी.

आज मिताली राज, हरमनप्रीत कौर, पूनम राउत, एकता बिष्ट, दीप्ती शर्मा और बाकि सभी भारतीय खिलाड़ियों के नाम सभी जानते है.बीसीसीआई भी पुरुषों के मुक़ाबले बहुत थोड़ा-सा ही सही मगर कुछ पैसा तो दे रहा है वर्ना कभी किट या ज़रूरी सामान खरीदने के पैसै भी महिला खिलाड़ियों के पास नहीं होते थे.संध्या अग्रवाल साल 1993 में इंग्लैंड में हुआ पांचवां विश्व कप भी खेल चुकी हैं जहां वह 229 रन बनाकर सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ों की सूची में चौथे स्थान पर थीं.