गांवों या छोटे शहरों में खेल सुविधाओं का अभाव क्यों है?

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चार साल पहले ग्लास्गो में जीते गोल्ड मेडल्स में सीधे 11 का इजाफा ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में देखा गया। भारत के लिए यह अच्छा प्रदर्शन तो है ही, पदकों के लिहाज से अब तक का तीसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी है। 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 38 गोल्ड सहित 101 पदकों के साथ दूसरा, जबकि 2002 में 30 गोल्ड सहित 69 पदक जीतकर चौथा स्थान प्राप्त किया था। इस बार 26 गोल्ड सहित 66 पदक जीतकर तीसरे स्थान पर रहना भारत के लिए कुछ मायनों में 2002 से भी बेहतर है। 2002 में पदकों की तादाद वेटलिफ्टिंग में क्लीन एंड जर्क, स्नैच और ओवरऑल वजन में अलग-अलग पदक दिए जाने से बढ़ी थी। मौजूदा प्रणाली उस समय लागू होती तो भारत के 30 नहीं 23 गोल्ड मेडल होते। 2010 की तरह इस बार खेलों में तीरंदाजी और टेनिस भी शामिल होते तो दर्जन भर पदक बढ़ जाते। यानी बराबरी का हिसाब रखें तो भारत का इस बार का प्रदर्शन 2010 के बाद सबसे अच्छा है।

बेहतरीन प्रदर्शन

यह सही है कि शूटिंग, कुश्ती, वेटलिफ्टिंग और मुक्केबाजी में राष्ट्रमंडल खेलों का स्तर बहुत ऊंचा नहीं है। इसीलिए इनमें झोली भरकर पदक जीतना सिर्फ आत्मसंतुष्टि दिलाता है। फिर भी टेबल टेनिस, ऐथलेटिक्स और किसी हद तक बैडमिंटन में पदक जीतने के मायने हैं। टेबल टेनिस में मणिका बत्रा ने दो गोल्ड सहित चार पदक जीतकर धमाका कर दिया। इस खेल में भारत के 10 सदस्यीय दल का आठ पदक जीतना मायने रखता है। बैडमिंटन में सायना नेहवाल के दूसरी बार महिला एकल का गोल्ड जीतने और टीम गोल्ड दिलाने की जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है। भारत ने बैडमिंटन में दो गोल्ड, तीन रजत सहित छह पदक जीते। इस खेल में मलेशिया और इंग्लैंड जैसी मजबूत खिलाड़ियों वाली टीमों की मौजूदगी को देखते हुए यह प्रदर्शन बहुत मायने रखता है। ऐथलेटिक्स की बात करें तो इसमें पदकों के मामले में हम ग्लास्गो से आगे नहीं बढ़ पाए, पर इस बार के प्रदर्शन का सकारात्मक पहलू यह है कि पुरुषों की 400 मीटर दौड़ में मोहम्मद अनस का मामूली अंतर से चौथे स्थान पर रहना पदक जीतने जैसा ही है। यदि वह पदक जीत जाते तो मिल्खा सिंह के बाद इस स्पर्धा में ऐसा करने वाले दूसरे भारतीय होते। इसी तरह जिनसन जॉनसन का पुरुषों की 1500 मीटर दौड़ में पांचवां, तेजस्विन शंकर का पुरुष ऊंची कूद में छठां और अरपिंदर सिंह का तिकड़ी कूद में चौथा स्थान पाना बड़ी बात है। इनमें कुछ ने नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं।

भारतीय प्रदर्शन की एक दिलचस्प बात यह भी है कि बैडमिंटन, टेबल टेनिस और स्क्वॉश जैसे खेलों को छोड़कर ज्यादातर पदक जीतने वाले खिलाड़ी गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। जो आर्थिक तौर पर ठीक-ठाक हैं उनका भी ताल्लुक छोटे शहरों या गांवों से है। वेटलिफ्टिंग में गोल्ड जीतने वाली मीराबाई चानू और संजिता दोनों इंफाल के गरीब परिवारों से आई हैं और बड़ी मुश्किल से इस मुकाम तक पहुंची हैं। वाराणसी के दादूपुर गांव की पूनम यादव कहती हैं, ‘मेरा जन्म तो बेटे की चाहत में हो गया। बेटा जल्दी आ जाता तो मैं पैदा ही नहीं होती।’ पूनम ने अभी तक जीतों से मिलने वाली रकम से घर वालों के कर्ज ही चुकाए हैं। एक अन्य गोल्ड मेडलिस्ट सतीश शिवलिंगम के पिता के पास इतना पैसा भी नहीं था कि वह बेटे को कहीं अभ्यास करा सकें। इसलिए सतीश को नौकरी करके अपना करियर बनाना पड़ा। वेटलिफ्टर आरवी राहुल के पिता डंडे में वजन लटकवा कर अभ्यास कराते थे। गोल्ड जीतने वाले विकास कृष्ण, एमसी मैरीकोम, जीतू राय, मनु भाकर और विनेश फोगाट जैसे खिलाड़ी भी गांवों से ताल्लुक रखते हैं।

अब एक बात यह है कि जब ज्यादातर खिलाड़ी गांवों से आते हैं तो हमारे गांवों या छोटे शहरों में खेल सुविधाओं का अभाव क्यों है? प्रतिभाओं को तलाशने की देश में सही व्यवस्था हो और उन्हें उनके घर के आसपास ही प्रशिक्षित करने की सुविधाएं हों तो और भी बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं। हमारे यहां दिक्कत यह है कि खेल सुविधाएं दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नै और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में केंद्रित हैं। लेकिन कम उम्र में सामने आने वाली प्रतिभाओं का इन केंद्रों तक पहुंचना असंभव सा ही है। आप यह मानकर चल सकते हैं कि किसी खेल विशेष में यदि 100 प्रतिभाएं निकलती हैं तो 10 भी इन केंद्रों तक नहीं पहुंच पातीं। इसलिए क्षेत्रीय स्तर पर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो चमकने से पहले ही प्रतिभाओं का मुरझाना थम सकता है।

निशानेबाजी में उम्मीद

कॉमनवेल्थ गेम्स की निशानेबाजी का स्तर भले ही विश्वस्तरीय न हो, पर कई निशानेबाजों ने विश्व कप में पदक जिताने वाले प्रदर्शन किए हैं। 2016 के रियो ओलिंपिक में खराब प्रदर्शन के बाद जसपाल राणा जैसे लोगों को कोचिंग में लाने के प्रयास ने रंग दिखा दिया है। अब हमारे यहां पिछले दिनों गोल्ड की झड़ी लगाने वाली मनु भाकर, सबसे कम उम्र में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने वाले अनीश भानवाल, हिना सिद्धू, अपूर्वी चंदेला और मेहुली घोष जैसे युवा निशानेबाज हैं। इनको अभी से सही ढंग से प्रशिक्षित किया जाए तो ये सभी 2020 के टोक्यो ओलिंपिक में पदक के दावेदार बन सकते हैं। वेटलिफ्टर मीराबाई, संजिता, ऐथलीट मोहम्मद अनस, जिनसन जॉनसन, तेजस्विन शंकर, विपिन कृष्णा, हिमा दास, टेबल टेनिस खिलाड़ी मणिका बत्रा और पहलवान राहुल अवारे को भी ऐसे खिलाड़ियों में शामिल किया जा सकता है। इनके अलावा अभ्यास के लिए कुछ और युवा प्रतिभाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। ढंग से तैयारी की जाए तो भारतीय दल सन 2020 के टोक्यो ओलिंपिक में दर्जन भर पदक जीत सकता है।