खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं;विश्वनाथन आनंद,

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साल 1987 में भारत शतरंज का अपना पहला ग्रैंडमास्टर खिताब जीतने की जी-तोड़ कोशिशें कर रहा था। मैंने भी तीन बार प्रयास किए थे, मगर हर बार बहुत करीब पहुंचकर नाकाम रहा। उस वक्त एक वरिष्ठ ब्रिटिश सज्जन ने मुझसे कहा था, ‘एक दिन तुम ग्रैंडमास्टर का खिताब जीतोगे, तब तुम्हें इसका एहसास भी न होगा।’ खेल में चमत्कार होते हैं। वह ऐसा पल होता है, जब चीजें सही जगह पर बैठती हैं, जो एक चैंपियन के प्रदर्शनों को मुकम्मल बना देती हैं। अनेक वर्षों बाद, जब मैंने 2000 में अपना पहला वल्र्ड चैंपियनशिप जीता, तब मुझे उनकी वह सलाह याद आर्ई और कितनी सही थी वह? क्रिकेट के अलावा अन्य सभी खेलों के दिग्गजों में भारत को उसका जायज हिस्सा मिला। हमारी तादाद बहुत अधिक नहीं थी, बल्कि हमारी उपलब्धियां ज्यादातर इकलौती ही थीं। पर हमेशा किसी आंदोलन की शुरुआत एक छोटी कोशिश से होती है। चाहे वह गीत सेठी हों, प्रकाश पादुकोण हों या लिएंडर पेस, अपनी-अपनी विधाओं में हमारे खेल को उचित प्रतिष्ठा दिलाने के लिए उन्होंने भरपूर मेहनत की और अपना सर्वश्रेष्ठ दिया था। शतरंज में हमारे पास अब 50 ग्रैंडमास्टर्स हैं। अगले साल नीदरलैंड के विज्क आन जी शहर में आयोजित होने जा रहे टूर्नामेंट में चार भारतीय खिलाड़ी शामिल होंगे। यह भारतीय शतरंज की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति है।

अधिबान भास्करन ने तो पिछले साल इतना दिलचस्प शतरंज खेला कि शतरंज की प्रतिष्ठित पत्रिका न्यूज इन चेस ने उन्हें अपना मुखपत्र बनाया। महिलाओं में हमारे पास हरिका द्रोणवल्ली हैैं, जो मेरी राय में वल्र्ड चैंपियनशिन जीतने के बेहद करीब हैं। शतरंज की तैयारियों में बड़ा बदलाव टेक्नोलॉजी के कारण आया है। कंप्यूटरों ने शतरंज तक न सिर्फ पहुंच आसान बनाया, बल्कि इसे एक बड़े दर्शक समूह तक भी पहुंचाया है। इंटरनेट के इस्तेमाल ने शतरंज के खेलों को देखने, उनके संग्रह और विश्लेषण के जरिए सबके लिए समान मैदान तैयार किया है। मैं दुनिया भर के ‘सेकेंड्स’ (सहयोगी) खिलाड़ियों के साथ काम करता हूं, हम आइडिया का आदान-प्रदान करते हैं। इससे भारतीय खिलाड़ियों को काफी मदद मिली है, उन्हें विदेशी खिलाड़ियों के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। जो आइडिया एक खास दायरे में सीमित रह जाते थे, अब खुलकर वे साझा किए जाने लगे हैं। आज के ज्यादातर पेशेवर खिलाड़ी 10 साल पहले के मुकाबले कहीं बेहतर कौशल के साथ खेलते हैं।
अगर टेक्नोलॉजी ने शतरंज की मदद की है, तो इन्फ्रास्ट्रक्चर व विदेशी कोचों तक आसान पहुंच ने देश के अनेक खेलों का काफी भला किया है। हम ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट में प्रतिभाओं के प्रशिक्षण पर अच्छा काम कर रहे हैं। प्रतिभाओं को पहचानने व उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए कॉरपोरेट जगत और खेल अनुभव के बेहतरीन तालमेल का लाभ उठाया जा रहा है। निस्संदेह, सर्वश्रेष्ठ बुनियादी ढांचे के लिए भारत को अभी लंबी दूरी तय करनी है, पर अब हम अपने युवा एथलीटों के साथ काम करने और उन्हें दिशा देने में पूरी तरह सक्षम हैं। इसलिए जरूरी है  कि जब हम खेल संस्कृति की बात करते हैं, तो हमें ऐसा माहौल भी तैयार करना होगा, जिसमें प्रतिभाओं को फलन-फूलने का अबाध मौका मिले, न कि उन्हें अंतहीन दस्तावेजी उलझनों और सिफारिशों का शिकार बनना पड़े।

अनेक खेल विधाओं में हम कामयाबियां हासिल कर रहे हैं। बैडमिंटन हमारे देश के लिए एक बड़ा नया क्षेत्र है। इसी तरह, निशानेबाजी में काफी संभावनाएं दिख रही हैं। बॉक्सिंग और भारोत्तोलन में हमारे पास काफी प्रतिभाएं हैं। अब जब हम 2020 के टोक्यो ओलंपिक की बात कर रहे हैं, तो हमें उम्मीद है कि हम पदक तालिका में दोहरे अंकों वाली कतार में शामिल होंगे। हम एक खेल-प्रतिभा संपन्न देश हैं। आप किसी भी नौजवान खिलाड़ी से पूछिए कि तुम्हारा सपना क्या है? वह आपको विश्व चैंपियन बनने की ही बात कहेगा। और इसका क्या मतलब है? अपने तिरंगे को ओढ़ना और अपने राष्ट्रगान को बजते हुए गर्व से सुनना। क्योंकि इसी पल आप महसूस करेंगे कि आपने जो आंसू और पसीना बहाए, उसका एक-एक कतरा सार्थक हुआ। मेरा तो हमेशा यही सपना रहा और मुझे बेहद खुशी है कि मैंने वह क्षण जिया है।