गोल्ड मेडलिस्ट; संघर्ष की कहानी सुन भर आएगी आंखें

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कॉमनवेल्थ खेल में पहलवान बजरंग पुनिया ने भारत को कुश्ती में 17वां गोल्ड दिलाया। पुरुषों के 65 किग्रा भार वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए हरियाणा के इस लाल ने कॉमनवेल्थ खेल का अपना दूसरा मेडल जीता। 2014 ग्लासगो कॉमनवेल्थ में बजरंग पुनिया ने सिल्वर मेडल पर कब्जा किया था। धुरंधर भारतीय पहलवान और 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता योगेश्वर दत्त के चेले बजरंग के इस जादुई सफर पर एक नजर...

बजरंग को कुश्ती विरासत में मिली। उनके पिता बलवान पूनिया अपने समय के नामी पहलवान रहे। मगर गरीबी आगे आड़े आ गई। कुश्ती के लिए जरूरी डाइट तक के लाले पड़ जाते। पिता का अधूरा ख्वाब बेटे बजरंग के सपनों में तैरने लगा था। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य देश के लिए मेडल ही लाना रह गया था। मगर पैसा यहां भी अड़चन पैदा करने वाला बना। पिता के पास बेटे को घी खिलाने के पैसे नहीं होते थे।कहते हैं जिद्द और समर्पण हो तो हर मुश्किल आसान लगने लगती है, कुछ ऐसा ही बजरंग की कहानी में भी होता है। बस का किराया बचाकर उनके पिता अब साइकिल से चलने लगे थे। जो पैसे बचते, उसे वो अपने बेटे की डाइट पर खर्च करते थे। ऐसे हालातों से गुजरते हुए बजरंग ने पहलवानी की दुनिया में देश का नाम रोशन किया। बाद में ओलंपिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त की नजर उन पर पड़ी, जिनके अखाड़े में बजरंग उन्हीं की देखरेख में ट्रेनिंग करते हैं।

हरियाणा के बजरंग ने 2014 में कॉमनवेल्थ खेलों में 61 किलोग्राम वर्ग में रजत जीता था और इस बार वह अपने पदक के रंग को बदलने में कामयाब रहे। बजरंग ने पुरुषों की 65 किग्रा वर्ग स्पर्धा के फाइनल में वेल्स के पहलवान केन चैरिग को एकतरफा मुकाबले में 10-0 से मात दी। अपने गुरू योगेश्वर के चिर परिचित अंदाज में उन्होंने चैरिग को हाथों से जकड़कर पटका और दो अंक लिए. इसी अवस्था में उन्होंने वेल्स के पहलवान को रोल कर दो अंक और महज चंद मिनटों के भीतर ही चैरिग को चित करते हुए बजरंग ने सोना जीता।