राष्ट्रमंडल के पदक और ओलंपिक

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ऑस्ट्रेलिया का गोल्ड कोस्ट भारत के लिए शुभ साबित हुआ है। वहां आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में हमारे खिलाड़ियों ने अच्छा खेल दिखाया। दर्जन भर से अधिक स्वर्ण पदक हमारी झोली में आए हैं। बैडमिंटन (टीम के रूप में) में तो हमें पहली बार सोना मिला ही,भारोत्तोलन, कुश्ती, शूटिंग, बॉक्सिंग जैसे खेलों में भी हमने मेडल जीते। एथलेटिक्स के लिहाज से राष्ट्रमंडल खेल कभी हमारे लिए सुखद नहीं रहे थे, पर अब इसमें भी हम मैदान मारने लगे हैं। यह उपलब्धि काफी कुछ बयां कर रही है। बता रही है कि देश में खेल का माहौल बनाने का जो काम हो रहा है, वह असर दिखा रहा है। फिर भी, मैं मानता हूं कि कुछ कमियां हैं, जिनको दूर करने की जरूरत है।
हमें यह सोचना चाहिए कि राष्ट्रमंडल या एशियाई खेलों में अच्छा प्रदर्शन करता भारत ओलंपिक में क्यों पिछड़ जाता है? इसका एक जवाब यह है कि राष्ट्रमंडल या एशियाई खेलों में वे देश शामिल ही नहीं होते, जिनके खिलाड़ियों की तूती ओलंपिक में बोलती है। दक्षिण कोरिया, जापान, चीन जैसे देशों का नाम यहां लिया जा सकता है, जो ओलंपिक का हिस्सा तो होते हैं, लेकिन राष्ट्रमंडल में शामिल नहीं होते। यही हाल कुश्ती, बॉक्सिंग, शूटिंग जैसी इवेंट का है, जिसमें तकनीक व क्षमता के मामले में हम पर बीस साबित होने वाले दूसरे देशों के खिलाड़ी राष्ट्रमंडल खेलों में नहीं दिखते।
एक बात और। राष्ट्रमंडल जैसे आयोजनों में इसलिए भी हमारा खेल काफी अच्छा रहता है, क्योंकि कभी-कभी अच्छे खिलाड़ी उनमें शामिल नहीं होते। ऐसा इसलिए, क्योंकि राष्ट्रमंडल और एशियाई खेल, दोनों इवेंट एक ही साल आयोजित किए जाते हैं। खिलाड़ी दूसरे आयोजन में अच्छा प्रदर्शन करने की चाह में पहला टूर्नामेंट छोड़ देता है। कुछ खिलाड़ी इसलिए भी इनमें नहीं आना चाहते, क्योंकि वे ओलंपिक में भागीदारी को लेकर पूरी तरह समर्पित होते हैं।
सुखद बात है कि यह परिदृश्य अब बदल रहा है। राष्ट्रमंडल व एशियाई खेलों में हमारे खिलाड़ियों का खेल काफी सुधरा है। अब हम टेबल टेनिस जैसे टीम वर्क वाले खेलों में भी पदक जीतने लगे हैं। मगर ओलंपिक में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हमें देश की खेल संस्कृति को नई धार देनी होगी। एक स्तर के अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में जीत दर्ज कराने का अर्थ यह नहीं है कि हम अगले स्तर पर जीत दर्ज कराने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इसकी तैयारी हमें निचले स्तर से करनी होगी।
हमें ग्रामीण इलाकों पर अधिक से अधिक ध्यान देना चाहिए, क्योेंकि वहां से हमें काफी टैलेंट मिल सकता है। टूर्नामेंट कराके हम वहां से बच्चों को चुन सकते हैं, और उन्हें एक स्पोट्र्स पर्सन में रूप में ढलने में मदद कर सकते हैं। उन्हें कोच की सुविधा देकर और उनका डाइट ठीक करके हम उनका उचित मार्गदर्शन कर सकते हैं। यह एक लंबी योजना जरूर है, मगर इस पर संजीदगी से आगे बढ़ना चाहिए। मुश्किल यह है कि हम सिर्फ उसी साल सक्रियता दिखाते हैं, जिस साल इवेंट होने वाले होते हैं। जबकि हमें काफी पहले से अपनी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। जैसे 2020 में जापान में हो रहे ओलंपिक की तैयारी अपने यहां 2016 से ही शुरू हो जानी चाहिए थी। और 2024 के पेरिस ओलंपिक की 2020 से।
दरअसल, छोटी उम्र में सीखने की क्षमता कहीं ज्यादा होती है। अगर जूनियर लेवल पर ही अच्छे कोच दिए जाएंगे, तो न सिर्फ बच्चों की नींव मजबूत होगी, बल्कि बचपन में ही उन्हें तकनीक का ज्ञान हो जाएगा। मगर अपने यहां अच्छे कोच हाई-लेवल पर दिए जाते हैं। बड़े शहरों की बात छोड़ दें, तो हमारे ग्रामीण इलाकों में ऐसे-ऐसे स्कूलों को भी मान्यता मिली हुई है, जिनके पास बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। उनके पास अच्छे मैदान नहीं हैं। बच्चे अगर खेलेंगे नहीं, तो फिर खेल की तरफ उनका रुझान कैसे बढ़ेगा?
जमीनी स्तर पर काम करना ज्यादा जरूरी है। जिस तरह की ट्रेनिंग हमारे बच्चों को कॉलेज या विश्वविद्यालयों में मिलती है, वह दूसरे देशों में स्कूलों में ही मिलने लगती है। जाहिर है, उनकी तैयारी हमसे कहीं पहले शुरू हो जाती है। हमारी सरकार ने अब ‘खेल इंडिया’ कार्यक्रम शुरू किया है। देर से ही सही, लेकिन अच्छी मंशा के साथ शुरू की गई यह एक अच्छी पहल है। इनमें से जो अच्छे बच्चे निकलेंगे, उन्हें अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट के लिए तैयार करना चाहिए। संभव हो, तो यह सुविधा उन्हें अपने घर के आस-पास ही मिले। इससे बच्चे की पढ़ाई भी नहीं छूटेगी और वह खेल पर भी ध्यान दे पाएगा। 
एक जरूरत हमारे खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अधिक से अधिक भेजे जाने की भी है। विदेशों में खेलने से खिलाड़ी को अपनी क्षमता का एहसास होता है। साल 1976 के ओलंपिक में बतौर खिलाड़ी भाग लेने के लिए जब मैं कनाडा के मॉन्ट्रियल पहुंचा था, तो मुझे कुछ पता ही नहीं था। तब अगर 10-15 दिन पहले हम पहुंचते और विश्व स्तर के खिलाड़ियों के साथ हमें 4-5 रेसिंग मिल जाती, तो संभव है कि तस्वीर कुछ और होती। हमें पता चल जाता कि हम कहां खड़े हैं? इससे हमें अपनी गलतियों को सुधारने का वक्त मिलता। जब तक इस तरह के कॉम्पिटिशन नियमित अंतराल पर खिलाड़ियों को नहीं मिलेंगे, उन्हें अपने बारे में पूरा पता नहीं चल पाएगा।
यह भी अच्छी बात है कि अब लोगों में खेल को लेकर रुझान बढ़ा है। अभिभावक इसमें रुचि लेने लगे हैं। खेलों में पैसा भी आया है। हरियाणा जैसे राज्य पदकवीर खिलाड़ियों को अच्छा-खासा इनाम देने लगे हैं। नौकरी मिलने की उम्मीद भी होती है। इन सबका खासा असर पड़ा है। अभी तो एक खिलाड़ी ही हमारा खेल मंत्री है। इसका भी प्रभाव पड़ रहा है। देश में खेल की संस्कृति बदल रही है। इस बदलाव का आगे की प्रतियोगिताओं में निश्चय ही अच्छा असर पड़ेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)