गरीबी से लड़ी, अब भारत को दिलाया बॉक्सिंग में सिल्वर मेडल

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नई दिल्ली. भारतीय मुक्केबाज मंजू रानी  को खुद की पहचान बनाने की ललक ने मुक्केबाजी दस्ताने पहनने को प्रेरित किया और रिंग में उतरने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. पहली बार महिला वर्ल्ड चैंपियनशिप  में भाग लेने वाली उन्नीस साल की मंजू  को रविवार को उलान उदे में हुए फाइनल में पराजय के बाद रजत पदक से संतोष करना पड़ा .इस मुक्केबाज को लाइट फ्लायवेट (48 किलो) वर्ग के फाइनल में रूस की एकातेरिना पाल्सेवा ने 4-1 से हराया. गृह राज्य हरियाणा से मौका नहीं मिलने पर राष्ट्रीय चैंपियनशिप  में पंजाब  का प्रतिनिधित्व करने वाली मंजू विश्व चैंपियनशिप  के फाइनल में जगह बनाने वाली एकमात्र भारतीय थी.

पिता की कैंसर के कारण हो गईं थी मृत्यू

शनिवार को 20 बरस की होने जा रही मंजू ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘मेरे लिए यह जन्मदिन का समय से पहले मिलने वाले तोहफे की तरह हैं.’रोहतक के रिठाल फोगाट गांव की रहने वाली मंजू के लिए चीजें इतनी आसान नहीं थी. सीमा सुरक्षा बल में अधिकारी के पद पर तैनात उनके पिता का कैंसर के कारण 2010 में निधन हो गया था. इसके बाद उनकी मां इशवंती देवी ने उनके चार भाई-बहनों का लालन पालन किया. उनकी मां के लिए नौ हजार रुपए की पेंशन में परिवार को पालना आसान नहीं था .

मंजू ने कहा, ‘मैंने करियर की शुरुआत कबड्डी खिलाड़ी के तौर पर की थी लेकिन वह टीम खेल है. मुक्केबाजी ने मुझे आकर्षित किया क्योंकि यह व्यक्तिगत खेल है. यहां जीत का श्रेय सिर्फ आपको मिलता है.’ उन्होंने कहा, ‘मां ने करियर चयन के मामले में मेरा पूरा समर्थन किया. उन्होंने हर समय मेरा साथ दिया.’ मंजू को ओलिंपिक पदक विजेता विजेंदर सिंह और एम सी मैरीकॉम से प्रेरणा मिलती है.

मैरीकॉम और विजेंद्र सिंह से प्रेरित मंजू

उन्होंने कहा, ‘विजेन्द्र भईया और मैरीकॉम दीदी ने कई लोगों को प्रेरित किया है और मैं भी उनमें से एक हूं. उनकी उपलब्धियों को देखकर आपको और मेहनत करने की प्रेरणा मिलती है. मैं उनके खेल को देखती थी और फिर इससे जुड़ने के बारे में सोचा.’मंजू ने इस मौके पर आपने चाचा साहेब सिंह के योगदान को याद करते हुए कहा वह उनके कारण ही आक्रामक मुक्केबाज बनी. उन्होंने कहा, ‘मजेदार बात यह है कि वह (साहेब सिंह) मुक्केबाजी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते थे. ऐसे में मुझे सिखाने के लिए वह पहले खुद सीखते थे. लेकिन इस खेल का सीखना मेरे लिए अच्छा रहा.’उन्होंने बताया कि खेल को सीखने के बाद उन्हें मौके की तलाश थी और हरियाणा से मौका नहीं मिलने पर उन्होंने कही और से खेलने का फैसला किया. मंजू ने कहा, ‘मैंने पंजाब विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और प्रतियोगिता में भाग लेना शुरू किया. राज्य टीम में जगह बनाने के बाद राष्ट्रीय चैंपियनशिप में जगह पक्की की और जनवरी में भारतीय शिविर का हिस्सा बनी.’