भारतीय हॉकी के इतिहास के 10 महानतम हॉकी खिलाड़ी

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एक समय जहां भारत हॉकी की दुनिया में राज करता था और आज के आलम से आप सब परिचित हैं. इसी बीच भारतीय हॉकी में कई ऐसे महान खिलाड़ी आए जिन्होंने अपने शानदार हुनर से इस खेल की लोकप्रियता को बनाए रखा. आइए नजर डालते हैं भारतीय हॉकी के इतिहास के ऐसे ही10 महानतम खिलाड़ियों पर.
 
मेजर ध्यानचंद 
भारतीय हॉकी इतिहास का सबसे स्वर्णिम समय मेजर ध्यानचंद के दौर को कहा जाता है. मेजर ध्यानचंद को “द विज़ार्ड” के नाम से भी जाना जाता था. ऐसा इसलिए क्योंकि ध्यानचंद जब मैदान पर हॉकी खेलने उतरते थे तो अपनी फुर्ती से वो विरोधी खिलाड़ियों को छका कर आसानी से गोल दाग देते थे. 
मेजर ध्यानचंद के शानदार खेल की बदौलत  भारत (ब्रिटिश भारत) ने 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में गोल्ड मेडल पर कब्जा किया. अपने पूरे करियर में मेजर ध्यानचंद ने 400 गोल दागकर हॉकी के इतिहास मे सबसे ज्यादा गोल लगाने का रिकॉर्ड भी ध्यानचंद के नाम है. मेजर ध्यानचंद को भारतीय सरकार ने पद्म भूषण अवॉर्ड से भी नवाजा है. 3 दिसंबर 1979 को ध्यानचंद ने दुनिया को अलविदा कह दिया था.
 
बलबीर सिंह सीनियर 
मेजर ध्यानचंद के बाद यदि किसी हॉकी खिलाड़ी का नाम याद आता है तो वो हैं बलबीर सिंह सीनियर. उन्होंने भारतीय हॉकी का अब तक का सबसे बेहतरीन सेंटर फॉरवर्ड खिलाड़ी माना जाता है. बलबीर सिंह सीनियर भारत की तरफ से केवल दूसरे ऐसे हॉकी खिलाड़ी हैं जिन्होंने ओलंपिक में खेलते हुए भारत को लगातार 3 बार गोल्ड मेडल दिलवाया है. 1948 के लंदन ओलंपिक, 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक और1956 में आयोजित मेलबर्न ओलंपिक में भारत को गोल्ड मेडल दिलवाने में बलबीर सिंह की अहम भूमिका रही थी. इसके अलावा 1958 और1962 में हुए एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीतने वाली भारतीय टीम में भी बलबीर सिंह सीनियर शामिल थे.
 
बलबीर सिंह के नाम एक मैच में सबसे ज्यादा गोल दागने का रिकॉर्ड है. 1952 के ओलंपिक में नीदरलैंड के खिलाफ हुए मैच में उन्होंने लगातार 5 गोल दागकर इतिहास रचा था. यह रिकॉर्ड आजतक अटूट है. वहीं बलबीर सिंह सीनियर पहले ऐसे स्पोर्ट्स खिलाड़ी हैं जिन्हें पद्म श्री के खिताब से नवाजा गया था. हॉकी फील्ड से रिटायर होने बावजूद बलबीर सिंह हॉकी से नहीं रिटायर हुए.1975 में जब भारतीय हॉकी टीम ने वर्ल्ड कप में गोल्ड मेडल जीता तो बलबीर सिंह सीनियर कोच के साथ-साथ टीम के मैनेजर थे. बलबीर सिंह का नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है.
मोहम्मद शाहिद
मोहम्मद शाहिद भारतीय हॉकी के बेहतरीन उम्दा हॉकी खिलाड़ियों में से एक रहे हैं. मोहम्मद शाहिद ने अपने खेल से भारतीय हॉकी को एक नई पहचान दी थी. मोहम्मद शाहिद का हॉकी खेलने का तरीका और उनके ड्रिब्लिंग कौशल क्षमता के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाता है. 
गेंद को अपने हॉकी स्टिक से विपक्षी टीमों से छीनकर अलग ले जाने में मोहम्मद शाहिद का कोई जबाव नहीं था.1980 की चैंपियंस ट्रॉफी में बेस्ट फॉरवर्ड का खिताब अपने नाम करके शाहिद ने भारतीय हॉकी को अलग मुकाम तक पहुंचा दिया था. मास्को में हुए 1980 के ओलंपिक में जब भारतीय टीम ने वहां गोल्ड मेडल जीता तो उसमें शाहिद का अहम योगदान रहा था. 
1980-81 में अपने खेल से नई ऊंचाई को छूने वाले मोहम्मद शाहिद को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया था तो 1986 में उन्हें पद्म श्री अवॉर्ड भी मिला. 1982 के मोहम्मद शाहिद के खेल से प्रभावित होकर शाहिद को 1986 में एशियन ऑल स्टार टीम में जगह दी गई थी. मोहम्मद शाहिद और उनके साथी खिलाड़ी जाफर इकबाल के साथ उनकी  जोड़ी वर्ल्ड हॉकी में सबसे मजबूत डिफेंस के तौर पर याद की जाती है जिसको भेदना उस दौर में किसी भी दूसरे टीम के लिए एड़ी-चोटी का काम होता था.
 
धनराज पिल्लै
धनराज पिल्लै भारतीय हॉकी के एक शानदार खिलाड़ी रहे हैं. 90 के दशक में भारतीय हॉकी को निखारने का श्रेय उन्हें ही जाता है. जिस दौर में हॉकी का खेल भारत में अपनी लोकप्रियता खोने लगा था उस समय धनराज पिल्लै ने सिर्फ अपने खेल से हॉकी के खेल को भारत में बचाए रखा था. धनराज पिल्लै अपने करियर में 3 ओलंपिक, 3 वर्ल्ड कप के साथ 4 बार एशियन गेम्स में भारतीय टीम का हिस्सा रहे जो किसी भी भारतीय हॉकी खिलाड़ी के द्वारा बनाया गया एक रिकॉर्ड है.
 
मोहम्मद शाहिद की ही तरह धनराज पिल्लै विपक्षी टीम के खिलाड़ियों के आगे अपने हॉकी स्टिक के सहारे पल में ही गेंद को काबू में कर लेते थे और विपक्षी टीम के पास इनका कोई तोड़ नहीं था. धनराज पिल्लै को1995 में अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया तो साथ ही 1998-99 में हॉकी के खेल में शानदार परफॉर्मेंस के लिए के. के बिरला अवॉर्ड से नवाजा गया. भारत सरकार ने धनराज पिल्लै को राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड 1999 में दिया तो इसके अलावा पद्म श्री के खिताब से सन् 2000 में सम्मानित किया गया. 1994 में धनराज पिल्लै को वर्ल्ड इलेवन टीम में शामिल किया गया था. खास बात ये थी कि भारत के तरफ से वर्ल्ड इलेवन टीम में शामिल होने वाले धनराज पिल्लै पहले भारतीय खिलाड़ी थे. 
अजीत पाल सिंह
अजीत पाल सिंह ने रतीय हॉकी टीम में कप्तान के तौर पर अपनी खास पहचान बनाई थी.अजीत पाल सिंह अपने दौर में भारत के सबसे बेहतरीन सेंटर-हाफ खिलाड़ी के तौर याद किए जाते हैं. अजीत पाल सिंह 1975 क्वालालंपुर में भारतीय टीम के पहली बार वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे थे. उन्हें 1970 में अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया तो वहीं 1992 में पद्म श्री का खिताब दिया गया. इसके साथ ही 2012 के ओलंपिक में अजीत पाल सिंह को भारत के तरफ से हेड ऑफ मिशन बनाया गया जो ओलंपिक में भारत की टीम के एम्बेसडर बने थे.
 
ऊधम सिंह
ऊधम सिंह को आज भी भारतीय हॉकी के इतिहास में भारतीय टीम के एक मजबूत स्तंभ के तौर पर याद किया जाता है. ऊधम सिंह ने अपने उम्दा प्रदर्शन की बदौलत भारतीय हॉकी  के इतिहास में अपनी एक खास जगह बनाई. 1949 में अफगानिस्तान के खिलाफ अपने करियर की शुरूआत करने वाले ऊधम सिंह 4 ओलंपिक सीजन में भारतीय टीम का हिस्सा रहे थे. लेस्ली क्लॉडियस के बाद ऊधम सिंह ओलंपिक में 3 गोल्ड मेडल और एक सिल्वर मेडल जीतने वाले भारत के तरफ से केवल दूसरे खिलाड़ी हैं. 
 
1965 में ऊधम सिंह को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया था. इसके साथ-साथ ऊधम सिंह भारतीय टीम के कोच पद पर भी रहे थे. 1968 मैक्सिको में हुए ओलंपिक में वे सिल्वर मेडल जीतने वाली भारतीय टीम के कोच के रूप में मौजूद थे. वहीं 1970 के एशियन गेम्स में भी भारतीय टीम के कोच की भूमिका ऊधम सिंह ने ही निभाई थी.
गगन अजीत सिंह
महान हॉकी खिलाड़ी अजीत पाल सिंह के बेटे गगन अजीत सिंह को भी भारतीय हॉकी के महानतम खिलाड़ियों के रूप में गिना जाता है. गगन अजीत सिंह भारत के बेहतरीन स्ट्राइकर थे. गगन अजीत सिंह ने मैदान के बीचों-बीच अपने आक्रामक स्टाइक क्षमता के सहारे कई बार विपक्षी टीमों को चित किया था.1997 में अपने करियर की शुरूआत करने वाले गगन अजीत सिंह ने अपने करियर में कई कीर्तिमान अपने नाम किए हैं. 
 
गगन की कप्तानी में भारतीय जूनियर टीम ने 2001 में हॉकी जूनियर वर्ल्ड़ कप विजेता जीता था. गगन 2002 और 2004 के ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे जिसमें भारतीय टीम ने 7वां स्थान अर्जित किया था. गगन अजीत सिंह के करियर में सबसे खास बात ये रही थी कि उन्हें क्ल्ब हॉकी टूर्नामेंट में भारत से बाहर जाकर अपने खेल का जौहर दिखाने का मौका मिला. 2005 तक गगन अजीत सिंह नीदरलैंड के क्लब हॉकी टीम एच सी क्लीन के साथ जुड़े रहे थे.  गगन अजीत सिंह 2002 में ऑल एशियन टीम में शामिल इकलौते भारतीय हॉकी खिलाड़ी थे. 2002 में गगन अजीत सिंह को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया था.
 
अशोक कुमार  
गगन अजीत सिंह के बाद एक और महान हॉकी खिलाड़ी के बेटे का नाम महान खिलाड़ियों में गिना जाता है. वो हैं हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार. अशोक ने भी अपने पिता की ही तरह भारतीय हॉकी में कई परचम लहराए हैं. जब मैदान पर अशोक कुमार होते थे तो उनके हत्थे आई गेंद उनके पास से कहीं जाती नहीं थी. गेंद पर जबरदस्त कंट्रोल के लिए उन्हें याद किया जाता है. 
 
अशोक कुमार उन हॉकी खिलाड़ियों में शामिल हैं जिन्होंने लगभग 4 बार वर्ल्ड कप में शिरकत करी थी. 1975 में भारत को हॉकी का वर्ल्ड चैंपियन बनानें में अशोक कुमार का अहम योगदान था. वर्ल्ड कप 1975 में पाकिस्तान के खिलाफ विजयी गोल लगाकर अशोक कुमार ने ही भारत को पहली बार वर्ल्ड चैंपियन बनाया था. 2 ओलंपिक गेम्स में अशोक कुमार ने भारत की तरफ से शिरकत की थी.1974 में अशोक कुमार को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया. सबसे खास बात ये रही थी पिता ध्यानचंद ने 1974 में एशियन ऑल स्टार गेम के दौरान अशोक कुमार को पहली बार खेलते हुए देखा था. 
लेस्ली क्लॉडियस
भारतीय हॉकी के इतिहास में लेस्ली क्लॉडियस का नाम बेहद ही स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है. मेजर ध्यानचंद के दौर में लेस्ली क्लॉडियस का नाम भारतीय हॉकी प्रशंसकों के बीच काफी मशहूर था. लेस्ली क्लॉडियस भारत के उस टीम का हिस्सा रहे थे जब भारत ने 1948, 1952, 1956 के ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता था तो वहीं 1960 में भारत के सिल्वर मेडल जीतने वाली टीम में भी वे शामिल रहे थे.
 
लेस्ली क्लॉडियस पहले ऐसे हॉकी खिलाड़ी बने थे जिन्होंने 4 ओलंपिक टूर्नामेट में अपनी भागीदरी दी थी तो साथ ही भारत की तरफ से पहले ऐसे हॉकी खिलाड़ी बने थे जिन्होंने भारत के लिए 100 इंटरनेशनल मैच खेले थे. मेजर ध्यानचंद के साथ लेस्ली क्लॉडियस को भी भारत के महान हॉकी खिलाड़ी के तौर पर याद किया जाता है. 1960 रोम ओलंपिक में उन्होंने भारतीय टीम के कोच की भूमिका निभाई जिसमें भारतीय टीम ने सिल्वर मेडल पर कब्जा किया था. 
 
बाबू निमल
भारतीय हॉकी इतिहास में मैदान पर टीम के साथ डिफेंस संभालने वाले सबसे बेहतरीन फुलबैक पोजीशन के खिलाड़ी के तौर पर बाबू निमल को हॉकी इतिहास में लंबे समय तक याद किया जाएगा. बाबू 1936 के ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय टीम में शामिल सबसे उपयोगी खिलाड़ियों में से एक थे. उस ओलंपिक में बाबू निमल फाइनल सहित केवल 3 मैचों में ही अपनी मौजूदगी दे पाए थे पर अपने शानदर डिफेंस फुलबैक पोजीशन से भारतीय हॉकी के इतिहास में अपने नाम को अमर कर गए. 21 फरवरी 1998 को बाबू निमल ने अंतिम सांस ली थी.