जमुना के मुक्के का दम

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वो बेहद गरीब है, असम के छोटे से गांव में उसका घर है. दस साल की उम्र में ही उसके सिर से पिता का हाथ उठ गया था. पर मां की हिम्मत और उसके बुलंद इरादों ने उसे देश की बेहतरीन मुक्केबाज बना दिया. असम के शोणितपुर जिले में छोटे से गांव में जन्मी जमुना बोडो आज भारतीय महिला मुक्केबाजी में जाना पहचाना नाम हैं. जमुना के मुक्के का दम दुनिया कई बार देख चुकी है. एक गरीब परिवार से अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज बनने का सफर जमुना के लिए आसान नहीं था.

जमुना सिर्फ दस साल की थी. जब उनके पिता जी इस दुनिया से चले गए. बच्चे सदमें थे, मां बेहाल थी. अब बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उनपर थी. जमुना ने आजतक डॉट इन से बातचीत में बताया कि उनकी मां बहुत हिम्मत वाली औरत हैं. जिनकी वजह से मैं मुक्केबाज बन सकी. पिता के देहांत के बाद घर चलाने के लिए जमुना की मां ने सब्जी बेचने का फैसला किया. मां बेलसिरी गांव के रेलवे स्टेशन के बाहर सब्जी बेचने लगी. इस तरह से जिंगदी पटरी पर लाने की कोशिश शुरू हो गई. जमुना स्कूल जानें लगी और मां बड़ी बहन की शादी कर दी. इसके अलावा उनका बड़ा भाई है जो पूजा पाठ का काम करता है. अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बनने के बावजूद उन्हें अब भी पैसों की बड़ी परेशानी होती है. देश में ट्रैवल करने के लिए घर से पैसे मांगने पड़ते हैं.

ये उन दिनों की बात है जब मैरीकॉम के नाम का डंका दुनिया भर में बजता था. पर जमुना के गांव में वुशु गेम खेला जाता. स्कूल से लौटते वक्त अक्सर वह लड़कों को इस खेल को खेलते देखती थीं. वुशु जूडो-कारटे और टाइक्वांवडो की तरह एक मार्शल आर्ट है. इस खेल में जमुना को मजा आने लगा. उन्हें यह खेल इतना रोमांचकारी लगता था कि वह खुद को रोक नहीं पाईं और लड़कों के साथ वुशु खेलना शुरू कर दिया. जल्द ही जमुना को इस बात का एहसास हुआ कि वुशु गेम में उनके लिए कोई खास संभावना नहीं है. उन्होंने बॉक्सर मैरीकॉम के बारे में काफी कुछ सुन रखा था. वो बॉक्सिंग सीखना चहाती थी. लेकिन गांव में इसकी ट्रैनिंग की कोई सुविधा नहीं थी.

जमुना ने बॉक्सर मैरीकॉम के बारे में काफी कुछ सुन रखा था. वह बॉक्सिंग सीखना चहाती थी. लेकिन गांव में इसकी ट्रैनिंग की कोई सुविधा नहीं थी. जब उन्होंने अपने कोच से बात की तो उन्होंने भी यही राय दी कि तुम्हें बॉक्सिंग सीखनी चाहिए. कोच को यकीन था कि अगर इस लड़की की ट्रैनिंग मिले तो यह बेहतरीन बॉक्सर बन सकती है. जमुना बातती है कि मैरीकॉम से उन्हें प्रेरणा मिली. जब वह तीन बच्चों की मां होकर बॉक्सिंग सीख सकती है तो मैं क्यों नहीं? वह मेरी रोल मॉडल हैं मैं उनकी तरह बनना चाहती हूं. फिर क्या था जमुना की लगन और कोच की मदद से उन्होंने असम से गुवाहाटी जाने का फैसला किया. मां से आर्शीवाद लेकर उन्होंने बॉक्सिंग शुरू की और देखते ही देखते आगे बढ़ती चली गईं. जमुना ने आजतक डाट इन से बातचीत में बताया कि जब उन्हें भारतीय महिला बॉक्सिंग टीम के कैंप में शामिल किया गया. वो लम्हा उनके लिए बेहद खास था. इंदिरा गांधी स्टेडियम में लगे कैंप ने मैरीकॉम और एल सरीता देवी जैसी खिलाड़ी उनके साथ हीं. पांच बार की वर्ल्ड चैंपियन और ओलंपिक मैडलिस्ट मैरीकॉम के साथ पंचिंग प्रैक्टिस करना उसके जीवन का सबसे बड़ा पल था.

साल 2013 जमुना के लिए बेहद खास रहा. उस साल सर्बिया में इंटरनेशनल सब जूनियर गर्ल्स बॉक्सिंग टूर्नामेंट में उन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर देश को एक बड़ा तोहफा दिया. इसके बाद साल 2014 में रूस में बॉक्सिंग टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीकर वह चैंपियन बनीं. 2015 में ताइपे में यूथ वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता. लेकिन बावजूद इसके वो नौकरी पाने के लिए जद्दोजेहद में लगीं है. बॉक्सिंग के जानकार और कोच हिमांशु चौधरी की माने तो अगर वक्त रहते ऐसे होनहार मुक्केबाज को नौकरी मिल जाए तो वो दुनिया की बेहतरीन मुक्केबाज बन सकती हैं. उन्हें डर भी जताया कि अगर ऐसे खिलाड़ियों को सरकार अनदेखी करेगी तो हम किसी बड़ी प्रतियोगिता में पदक की उम्मीद नहीं रख पाएंगे. खिलाड़ियों का हौसला टूटेगा वो अलग.जमुना का अगला लक्ष्य 2020 में टोक्यों में होने वाले ओलंपिक खेलों में हिस्सा लेने पर हैं. इसके लिए वो प्रैक्टिस में जुटी हैं. जमुना कहती हैं. अब मेरा लक्ष्य ओलंपक पदक है. जिसके लिए मैं अभी से तैयारियों में जुटी हैं.