कबड्डी में भारत की हार खतरे की घंटी......

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एशियाड में रुचि लेने वाले को बात करते समय आपने अकसर सुना होगा कि अरे एक गोल्ड तो पक्का ही है -कबड्डी में. इस आत्मविश्वास के पीछे वजह भी थी. वजह थी यह सोच कि भारत के गांव-गांव में खेले जाने वाले इस खेल में भारत को कौन हरा देगा. पाकिस्तान-बांगलादेश को छोड़ दें तो बाकी दुनिया इस खेल से वैसे वाकिफ नहीं थी जैसे भारत. क्योंकि यह खेल देश की रग-रग में समाया हुआ था. 1990 में जब से एशियाई खेलों में कबड्डी को शामिल किया गया भारत तब से इसका स्वर्ण पदक अपने नाम कर रहा था. लेकिन 2018 के एशियाई खेलों में यह बादशाहत टूट गई. भारत को कांस्य से संतोष करना पड़ा.

एशियाड कबड्डी के सेमीफाइनल में ईरान ने भारत को 27-18 से हरा दिया. इस हार को एकतरफा ही कहा जा सकता है. एेतिहासिक विशेषण जीत के साथ ही ठीक लगता है, लेकिन कबड्डी में यह भारत की ऐतिहासिक हार है. यह खतरे की एेसी घंटी है, जिसे ठीक से नहीं सुना गया तो हमारे पास कबड्डी में भी सुनाने के लिए वही कहानियां रह जाएंगी जो आज हम हॉकी के लिए सुनाते हैं कि भारत कभी हॉकी में दुनिया की महाशक्ति रहा था. फुटबॉल में भी एशिया में कम से कम भारत एक हैसियत रखता था. लेकिन इन दोनों खेलों में देखते-देखते देश अर्श से फर्श पर पहुंच गया. कबड्डी को लेकर भी सोशल मीडिया पर ऐसी ही चिंता जताई जा रही है. यह स्वाभाविक ही है.

आकाशवाणी इलाहाबाद में कार्यरत खेल विशेषज्ञ दीपेंद्र सिवाच कहते हैं, ‘कबड्डी में भारत की हार किसी भी खेल में पदक जीतने की खुशी से ज्यादा गहरा आघात पहुंचाने वाली है. इस हार में हॉकी की दुर्दशा वाली बू आ रही है. अगर समय रहते नहीं चेता गया तो कबड्डी का हश्र भी वही होने वाला है.’ खेल पत्रकार संतोष शुक्ल कहते हैं, ‘देश में खेल संस्कृति को प्रोत्साहित करने की बात हो रही है. लेकिन कबड्डी जैसे पारंपरिक भारतीय खेल, जिसमें कुछ ही टीमें अच्छी हैं उसमें हमारा हारना सारे दावों पर प्रश्न चिह्न लगा देता है. लीग मैच में दक्षिण कोरिया के हाथों 24-23 से हार ही चौंका देने वाली थी, लेकिन सेमीफाइनल में हम ईरान से 27-18 से हारे. जो बता रहा है कि ईरान लगातार अपने खेल में सुधार कर रहा है और हमारी टीम की स्किल घट रही है.’

कबड्डी में भारत की टीम का स्वर्ण पक्का माना जा रहा था, लेकिन उसे कांस्य से संतोष करना पड़ा. इस खेल में गहरी दिलचस्पी रखने वाले सुनील कैथवास कहते हैं, ‘कबड्डी शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप भर का खेल था. भारत के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश ही मजबूत टीमें थीं. तब तक हम इस खेल में अव्वल थे. लेकिन अब खेल ग्लोबल हो रहा है. आपको अधिक पेशेवर होना होगा.’

ईरान कबड़्डी में भारत के सामने लगातार चुनौती पेश कर रहा था. लेकिन भारत बेखबर था. जानकारों के मुताबिक दक्षिण कोरिया जैसे देश, जो खेलों के प्रति इतना पेशेवर रवैया रखते हैं, उनसे आप यह कह कर हमेशा नहीं जीत सकते कि कबड़्डी तो भारत की मिट्टी में बसा खेल है. दक्षिण कोरिया के कबड्डी कोच भारत के अश्न कुमार हैं. यह वही अश्न कुमार हैं जो 1990 में एशियाड की स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय कबड्डी टीम के कप्तान थे. दक्षिण कोरिया ने लीग मैच में न केवल भारत को हराया बल्कि सेमीफाइनल में पाकिस्तान को हराकर साबित कर दिया कि ईरान के अलावा भारतीय उपमहाद्वीप की टीमें दक्षिण कोरिया को भी गंभीरता से लेना शुरु कर दें.

वैसे कबड्डी में भारत का अजेय किला दरकने की शुरुअात 2016 में ही हो गई थी जब विश्व चैंपियनशिप में दक्षिण कोरिया ने भारत को हराया था. लेकिन तब इसे महज एक उलटफेर माना गया. खेल की दुनिया में कोई अजेय नहीं होता. लेकिन इस हार के बाद शायद हमें सबक लेना था जो हमने नहीं लिया. ईरान से भारत इस एशियाड में हारा, लेकिन इससे पहले के दोनों एशियाई खेलों में ईरान ही भारत के खिलाफ फाइनल में पहुंचा था. 2014 के एशियाई खेलों में ईरान ने भारत को कड़ी टक्कर दी थी. भारत किसी तरह से 27-25 से जीत पाया था. महज कुछ साल पहले ही ईरान में कबड़्डी फेडरेशन की स्थापना हुई. लेकिन उसका पेशेवर रवैया देखिए कि आज वह इस खेल की एशियाई महाशक्ति बनने की कगार पर है.

भारत और ईरान के सेमीफाइनल मुकाबले पर नजर डालें तो पहले हाफ में भारत का खेल खासा अाक्रामक रहा. पहले हाफ में भारत ने 6-1 की बढ़त बनाई. लेकिन शायद प्रो कबड़्डी लीग में खेलने वाले कई ईरानी खिलाड़ी भारत की खूबियों-खामियों का अच्छा अध्ययन करके आए थे. ईरान ने अपने डिफेंस पर सारी ताकत लगा दी और कई सुपर टैकल (जब विपक्षी टीम के पास तीन या उससे कम डिफेंडर बचे हों और विरोधी को रोक लें, तब उसे एक अतिरिक्त अंक मिलता है) कर स्कोर 9-9 कर लिया. दूसरे हाफ में कड़ा मुकाबला चल रहा था और भारत के पास 14-11 की बढ़त थी,लेकिन ईरानी डिफेंडरों ने फिर सुपर टैकल का सहारा लिया और अंतिम स्कोर 27-18 कर दिया.

भारत के कप्तान अजय ठाकुर मैच के दौरान चोटिल भी हो गए. जिसने ईरान का काम और आसान कर दिया. ईरान की टीम का रवैया पूरा पेशेवर था और उसके दिमाग में मैच जीतने का पूरा खाका था. अाक्रामक खेल के खिलाफ उसने अलग शैली का खेल दिखाया और भारतीय टीम को पटखनी दी. जाहिर है कि पिछले दस सालों से भारत को कड़ी टक्कर दे रहा ईरान सुदृढ़ रणनीति से खेल रहा था औऱ भारतीय टीम सिर्फ अपने पारंपरिक आत्मविश्वास से. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये चीजें हमेशा काम नहीं आती, भारत को अब यह सबक सीख लेने की जरूरत है. भारतीय कोच राम मेहर सिंह ने कहा भी कि कप्तान अजय ठाकुर का अति आत्मविश्वास टीम को ले डूबा.

खेलों को लेकर भारत में एक उपेक्षा भाव रहता है, लेकिन कबड्डी के मामले में किस्सा कुछ अलग दिखता है. प्रो कबड्डी लीग की शुरुआत ने इस ग्रामीण खेल को शहरी भारत में भी खासा लोकप्रिय किया है. अभिषेक बच्चन जैसे अभिनेता इससे जुड़े, ग्लैमर का तड़का भी लगा. लेकिन क्या इससे खेल को फायदा हुआ? खेल विशेषज्ञ दीपेंद्र सिवाच कबड्डी के लीग सिस्टम पर प्रश्न उठाते हैं. वे कहते हैं, ‘कबड़्डी को लीग सिस्टम ने लोकप्रियता के मायने में बहुत फायदा पहुंचाया. लेकिन क्या कारण है कि लीग शुरु होने के बाद हुए पहले ही एशियाड में टीम की एेसी दुर्गति हुई. इस पर विचार करना होगा कि लीग सिस्टम ने खेल की गुणवत्ता भी बढ़ाई या सिर्फ ग्लैमर ही बढ़ा.’

दरअसल प्रो कबड़्डी लीग ने भारत में खेल को लोकप्रिय बनाया तो विदेशियों खिलाड़ियों को इसमें खेलने का अवसर भी दिया. भारत के बाद ईरान और दक्षिण कोरिया के खिलाड़ियों की खासी मांग लीग में रही. ईरान के फजल अत्रलची एक करोड़ से ज्यादा में बिके. कई ईरानियों और कोरियाई खिलाड़ियों को अच्छे पैसे मिले. इसके अलावा भारत के खिलाड़ियों के साथ खेल के इन पहलवानों ने अपना स्तर सुधारा. फ्रेंचाइजी की कोचिंग का लाभ भी इन्हें मिला. दो बार की एशियाई विजेता टीम के सदस्य रहे अनूप कुमार कहते हैं, ‘प्रो कबड्डी लीग में खेलने से ईरान के खेल में बहुत सुधार हुआ है. आप उन्हें लीग में खेलने से नहीं रोक सकते. आपको अपना खेल सुधारना होगा.’ सोशल मीडिया पर खिलाड़ियों के चयन, कोच और कप्तान के बीच संवादहीनता की भी चर्चा हो रही है.

कबड्डी लीग में खेलकर दक्षिण कोरिया और ईरान ने तो अपना खेल सुधारा और भारत से निपटने की तरकीब अपनी नेशनल टीम को सिखाई, लेकिन शायद भारतीय खिलाड़ी अपने खेल के पुराने ढर्रे पर कायम रहे और बढ़ती प्रतिस्पर्धा को नहीं पहचान पाए. अब भारत सिर्फ इस बात से संतोष कर सकता है कि पाकिस्तान को भी कोरिया से हारकर कांस्य से संतोष करना पड़ा. लेकिन इस हार से भारत जितना जल्दी सबक ले, उतना अच्छा है क्योंकि भारत और पाकिस्तान में हॉकी के पतन की कहानी भी लगभग एक जैसी ही है.