बार बार कोच बदलना भारतीय हॉकी टीम के लिए अच्छा नहीं

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नई दिल्ली: रोलेंट ओल्टमेंस की बर्खास्तगी को अविश्वसनीय कदम बताते हुए भारतीय पुरूष हॉकी टीम के पूर्व कोच जोस ब्रासा ने आज कहा कि इस तरह बार बार कोच बदलना टीम के लिए अच्छा नहीं है। हॉकी इंडिया ने डच कोच ओल्टमेंस को पिछले कुछ टूर्नामेंटों में टीम के खराब प्रदर्शन के कारण पद से हटा दिया। 2009-10 में भारतीय हॉकी टीम के कोच रहे ब्रासा ने स्पेन से भाषा को दिए इंटरव्यू में कहा, ‘‘मुझे भरोसा नहीं हो रहा कि ओल्टमेंस को हटा दिया है। भारतीय टीम अच्छा खेल रही थी और रोलेंट दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कोचों में से है।उनका विकल्प तलाशना मुश्किल होगा ।’’ ब्रासा के साथ भी दो साल के लिए करार किया गया था लेकिन ग्वांग्झू एशियाई खेल ( 2010 ) के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। इससे पहले नीदरलैंड के पाल वान ऐस, आस्ट्रेलिया के टैरी वाल्श, माइकल नोब्स और रिक चाल्र्सवर्थ की भी भारत से विवादित हालात में विदाई हो चुकी है। उक्रेन की राष्ट्रीय महिला टीम के सलाहकार रहे ब्रासा ने कहा कि बार बार कोच बदलने से टीम के प्रदर्शन पर विपरीत असर पड़ेगा।उन्होंने कहा,‘‘पिछले कुछ साल में सात कोच बदले गए। यह बार बार का बदलाव प्रदर्शन में निरंतरता के लिए अच्छा नहीं है। किसी भी कोच के लिए लंबा कार्यकाल जरूरी है ताकि वह विश्व स्तरीय टीम तैयार कर सके। खिलाडिय़ों को जानने समझने में समय लगता है। यह कोई जादू की छड़ी नहीं है।’’  

दुनिया के लगभग सभी देश ओलिंपिक साइकिल के हिसाब से कोच तय करते हैं. यानी ठीक एक ओलिंपिक के बाद कोच चुना जाता है, जिसे चार साल का वक्त दिया जाता है... अगले ओलिंपिक तक. भारत में ऐसा कोई रिवाज नहीं है. बल्कि ओल्टमंस तो महज एक साल बाकी रहते कोच बने थे, जब पॉल वान आस को अचानक हटाए जाने का फैसला किया गया था.

यह जरूर है कि ओल्टमंस सबसे ज्यादा समय तक कोच या हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर के तौर पर भारतीय हॉकी से जुड़े रहे. उन्हें सबसे ज्यादा अधिकार मिले. उन्होंने अपने मुताबिक टीम चुनी. ये सारी बातें हैं, जिसकी वजह से अभिनव बिंद्रा ने हॉकी इंडिया को सबसे प्रोफेशनल तरीके से काम करने वाली फेडरेशन बताया था. लेकिन कोच को हटाने का समय ऐसा नहीं है, जिसे प्रोफेशनल तौर पर सही कहा जा सके.नॉब्स को हटाया गया था, तो किस्मत से ओल्टमंस थे, जो हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर थे. उसके बाद जो भी कोच आया, ओल्टमंस साथ थे. बाद में उन्होंने चीफ कोच का रोल बड़ी आसानी से संभाल लिया. लेकिन अब ऐसा नहीं है. डेविड जॉन को अंतरिम जिम्मा दिया गया है. डेविड जॉन वो हैं, जिन्हें माइकल नॉब्स के समय भारतीय हॉकी ने जो भी कामयाबियां पाईं, उसका जिम्मेदार माना जाता है. लेकिन वो कोच नहीं हैं. एक तो वो फिजिकल ट्रेनर हैं. दूसरा, उन्हें ज्यादा समय नहीं हुआ है हाई परफॉर्मेंस डायरेक्टर बने हुए. ऐसे में भारत को नया कोच ढूंढना होगा. वो भी तब, जब वर्ल्ड कप सिर पर है और ओलिंपिक महज तीन साल दूर हैं.

पिछले कुछ सालों में भारतीय हॉकी सुधरी है, तो उसमें हॉकी इंडिया का बड़ा रोल है. लेकिन पिछले कुछ समय में हॉकी इंडिया ने कुछ फैसले ऐसे किए हैं, जो सवालों में हैं. वर्ल्ड कप जीतने के बाद हरेंद्र सिंह की जगह जूड फेलिक्स को कोच बनाना. अगर हरेंद्र को जूनियर से हटाया जाना था, तो उन्हें डेवलपमेंट टीम सौंपनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अभी तक आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. लेकिन माना जा रहा है कि 1980 की ओलिंपक स्वर्ण विजेता टीम के कप्तान रहे वी.भास्करन को डेवलपमेंट टीम दी जाएगी. यह टीम सीनियर और जूनियर के बीच की टीम होगी.

भास्करन कई बार भारतीय हॉकी टीम के कोच रहे हैं. उनका कोचिंग करियर भारतीय हॉकी में चूकने की कहानियां लेकर आता रहा है. वो केपीएस गिल का दौर था. उन्हें कई बार हटाया गया, फिर वापस लाया गया. हर बार वो आ भी गए. पहली बार भारत ने एशियाई खेलों में पदक नहीं जीता, वो भास्करन साहब की कोचिंग में हुआ. इन सारे रिकॉर्ड्स के साथ उनकी वापसी की बात है.

इस वक्त बताया जा रहा है कि ओल्टमंस को हटाए जाने में खिलाड़ियों का भी रोल है. खिलाड़ियों को लग रहा था कि अब उनके पास बताने के लिए कुछ नया नहीं है. उनसे वो सारी बातें सीखी जा चुकी हैं, जो उनके पास थीं. लेकिन यही सवाल तो भास्करन के लिए भी है. ...और यह सवाल भी कि अगर ओल्टमंस के पास सिखाने के लिए कुछ नहीं था, तो एक साल रुकने की क्या जरूरत थी? ऐसा तो गिल युग में होता था. हॉकी इंडिया के ‘प्रोफेशनल सेट-अप’ में चीफ कोच के मामले को ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से हैंडल किए जाने की उम्मीद थी, जो नहीं हुआ.