फुटबॉल की दीवानी अलखपुरा गांव की छोरियों

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भिवानी क्या आप यकीन करेंगे कि जुनूनी लड़कियों के एक ग्रुप ने अपने स्कूल के कोच पर इतना प्रेशर बनाया कि उन्हें कबड्डी, खो-खो छोड़कर मजबूरन फुटबॉल कोच बनना पड़ा। ...और उस कोच की फुटबॉल खेलने वाली छोरियां इस खेल की आला खिलाड़ी बन गईं हैं। एक छोटे से गांव की यह टीम सिर्फ आठ साल में सफलता की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते कई इंटरनैशनल खिलाड़ी पैदा कर चुकी है। अब यही टीम इंडियन विमिंस फुटबॉल लीग के पहले एडिशन में मजबूत दावेदार के रूप में उतरने जा रही है।

हरियाणा के भिवानी जिले के अलखपुरा गांव के सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 2006 में गेम टीचर गोवर्धन दास आए। उनकी ख्याति कबड्डी और खो-खो के अच्छे कोच के रूप में थी। उन्होंने अलखपुरा में भी टीम बनाने की पहल की। दसवीं क्लास तक के उस स्कूल में सिर्फ 60 बच्चे थे। वह बताते हैं कि मैंने शुरू में लड़कों को ट्रेनिंग दी। कुछ लड़कियों ने दिलचस्पी दिखाई पर मैंने टाल दिया। हमारे लड़कों ने जिले और राज्य स्तर पर अच्छा प्रदर्शन किया तो मुझ पर दबाव बढ़ने लगा। एक दिन हरियाणा सरकार ने पांच फुटबॉल भेजीं। मैंने यूं ही लड़कियों को दे दी और उन्हें खुद ही प्रैक्टिस करने को कहा। लड़कियों ने जब एक दिन उनसे स्कूल टूर्नमेंट में एंट्री दिलवाने को कहा तो वह हैरान रह गए। 2008 के टूर्नमेंट में लड़कियां फाइनल तक पहुंच गईं। सरकारी स्कूल की सफलता को देखते हुए बच्चे यहां दाखिला लेने लगे। देखते-देखते 60 से 600 बच्चे हो गए। तब मैंने खुद फुटबॉल कोचिंग ली। सिलसिला चलता रहा और अलखपुरा की टीम ने नैशनल लेवल का खिताब जीता।

अपनी लड़कियों की सफलता को देखते हुए अलखपुरा गांव ने 50 लाख रुपये जुटाकर स्टेडियम बनवाया। स्कॉलरशिप दी। सरकार ने भी अलखपुरा में फुटबॉल अकादमी बनाई और एक महिला कोच भी दी। 25 लड़कियों को स्कॉलरशिप के लिए चुना गया। आज अलखपुरा की 19 साल की संजू यादव सीनियर नैशनल टीम में शामिल हैं।