'जेंटलमेंस गेम' है क्रिकेट ?

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सन 2001 में पोर्ट एलिजाबेथ में साउथ अफ्रीका के खिलाफ खेले गए दूसरे टेस्ट मैच में सचिन तेंडुलकर पर गेंद से छेड़छाड़ का आरोप लगा। सचिन कहते रहे कि वह तो बस बॉल पर चिपकी मिट्टी हटा रहे थे, लेकिन उसी वक्त उन पर एक मैच का बैन लगा दिया गया। बाद में पता चला कि सचिन वाकई मिट्टी ही हटा रहे थे। घटना के 17 साल बाद केपटाउन में चल रहे साउथ अफ्रीका के खिलाफ तीसरे टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलियाई टीम ने पूर्वनियोजित तरीके से गेंद के साथ छेड़छाड़ की और यह भी माना कि टीम की पॉलिसी के तहत ऐसा किया गया, फिर भी आईसीसी ने कप्तान स्टीव स्मिथ को एक मैच के लिए बैन करके और छेड़छाड़ के अपराधी बैनक्रॉफ्ट पर सिर्फ जुर्माना लगाकर काम चला लिया है। 

आईसीसी के इस फैसले से न सिर्फ खेल भावना को चोट पहुंची है, बल्कि करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की निगाह में खुद प्रतिष्ठा गिरी है। साख तो क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की भी गिरी है, जो क्रिकेट इतिहास के गंभीरतम आरोप के बावजूद स्टीव स्मिथ को हटाना तो दूर, उन्हें हिलाने तक को राजी नहीं था। ऑस्ट्रेलियाई मीडिया के आवाज उठाने और प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल के कहने पर उसने स्मिथ को हटाने का फैसला किया। स्मिथ पर आजीवन बैन की मांग हो रही है। खेल से खेल करने वालों को खेल निकाला मिलना ही चाहिए। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया इस पर कान नहीं दे रहा। क्रिकेट ही नहीं, बल्कि समूचे खेल इतिहास में इस तरह की हरकतें अक्षम्य मानी गई हैं क्योंकि खेल कोई राजनीति नहीं, जहां साम, दाम, दंड, भेद का सिद्धांत चलता हो। मगर जिस तरह से खिलाड़ियों को इस अघोषित युद्ध में सिर्फ जीतने के लिए झोंक दिया गया है, उसे देखते हुए ऐसी घटनाएं स्वाभाविक लगने लगी हैं। एक समय ‘जेंटलमेंस गेम’ कहलाने वाला क्रिकेट अभी बहुत सारे फॉर्मैट्स में खेला जाता है। पांच दिनी टेस्ट मैच के अलावा तीन या चार दिन के ‘ए’ टेस्ट, 100 ओवर वाले वन-डे या 40 ओवर वाले टी-20 को तो आईसीसी ने मान्यता दी है। इसके अलावा भी कई तरीकों से यह खेल खेला जाता है। ऐसे में जीतने की जिद में खिलाड़ी गलती कर बैठते हैं, जिसके नतीजे भी उन्हें भुगतने पड़ते हैं। लेकिन योजना बनाकर बॉल-टैंपरिंग की सत्यकथा पहली बार सुनी गई है। अच्छा होगा कि यही अंतिम बार भी हो।