कलम छोड़कर हाथ में चप्पू उठाने पड़े.....

07

पालेमबांग : खेल के मैदान पर मिलने वाली सफलता के पीछे कई बार कोई मार्मिक कहानी होती है और मोगा से पालेमबांग में एशियाड फाइनल तक के सेना के रोअर भगवान सिंह का सफर भी दर्द से अछूता नहीं रहा है। छह साल पहले 19 साल के भगवान चंडीगढ से पत्रकारिता में बीए कर रहे थे। शायद वह पत्रकार बनकर आज एशियाई खेलों की कवरेज कर रहे होते लेकिन नशे के आदी अपने पिता की आर्थिक सहायता के लिए उन्हें कलम छोड़नकर हाथ में चप्पू उठाने पड़े।

इसके बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। एशियाई खेलों में लाइटवेट डबल स्कल्स फाइनल में पहुंचे भगवान ने बताया,‘मेरे पिता अभी भी बहुत बीमार हैं। उनका एक फेफड़ा काम नहीं कर रहा। मैं पत्रकार बनना चाहता था लेकिन मेरे पिता को ट्रक ड्राइविंग छोड़नी पड़ी क्योकि उन्हें टीबी हो गया था।’

उन्होंने कहा, ‘वह ड्राइविंग के दिनों में नशे के आदी हो गए। मुझे खुशी है कि वह जीवित हैं लेकिन उनकी हालत बहुत खराब है।’ लंबे और तंदुरूस्त भगवान ने 2012 में भारतीय सेना में दाखिला लिया और पुणे में सेना के रोइंग नोड से जुड़े। एशियाई खेलों में भाग ले रहे 34 भारतीय रोअर्स में से 33 सेना के हैं।

भगवान ने कहा ,‘मैने बहुत बुरा समय देखा है। मैं भगवान को धन्यवाद देता हूं कि मैं यहां तक पहुंचा। सेना को धन्यवाद। मैं अपने बूढे माता-पिता की देखभाल कर सकता हूं। पैसा ज्यादा नहीं है लेकिन अपने पिछले दौर को देखते हुए मुझे यह सुखद ही लगता है।’