पिता ने जानवरों का खाना खाया ताकि मैं ट्रेनिंग कर सकूं: गोल्‍ड मेडलिस्‍ट गोमती

07

30 वर्षीय गोमती ने स्वर्ण पदक प्राप्त करने के लिए 2.02.70 का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। गोमती ने कहा, “जब मैं अपनी प्रैक्टिस किया करती थी उस दौरान मेरे पिता को पैर की बीमारी थी, और वह चलने में असमर्थ थे। उनके पास एक दोपहिया वाहन (एक टीवीएस एक्सएल मोपेड) था जो हमारे लिए एक बड़ी बात थी। हमारे पास शहर जाने के लिए अच्छी बस सुविधा नहीं थी, मेरे शहर में बिजली नहीं थी, और सड़कें भी अच्छी नहीं थीं ”।चेन्नई में शुक्रवार को एक प्रेस मीटिंग में गोमती मारीमुथु ने नम आंखों से कहा, “मेरे पिता ने मुझे पौस्टिक भोजन प्रदान करने के लिए खुद मवेशियों के लिए रखा खाना खाया, ताकि मैं एथलेटिक्स की ट्रेनिंग ले सकूं।”

पिता का बलिदान

गोमती अपने दिवंगत पिता को बलिदानों को याद करती है, जिसमें हर सुबह चार बजे जागना, बीमारी के दौरान अपनी माँ की देखभाल करना शामिल है। वह अपने पिता को भगवान की तरह मानती हैं, “मुझे अपने पिता की याद आती है, चूंकि मैं खेल में थी और हमारे पास प्रयाप्त भोजन नहीं हुआ करता था। मेरे पिता ने मुझे पौस्टिक भोजन प्रदान किया और खुद मवेशियों का चारा खाया”।

पिता को याद करते हुए गोमती ने बताया, 'जब मैं चैंपियनशिप की तैयारी कर रही थी तब मेरे पिता चल नहीं पाते थे. मेरे गांव में बस की सुविधा नहीं है. पिता मुझे सुबह 4 बजे उठाते और मां के बीमार होने पर घर के काम में हाथ बंटाते. मुझे उनकी याद आती है. अगर वे जिंदा होते तो मैं उन्‍हें भगवान मानती.' गोमती का मेडल एशियन एथलेटिक्‍स चैंपियनशिप में भारत का पहला गोल्‍ड मेडल था.उन्‍होंने बताया कि भारत सरकार से उन्‍हें मदद नहीं मिली फिर भी उन्‍हें गोल्‍ड मेडल जीतने का भरोसा था. बकौल गोमती, 'मैंने काफी अभ्‍यास किया था और मुझे मेडल जीतने का भरोसा था. मैंने अकेले तैयारी की. मैं अपने खुद के पैसों से तैयार हुई.' हालांकि उन्‍होंने कहा कि भारतीय टीम के कोच ने फोन के जरिए वर्कआउट शेड्यूल को लेकर उनकी मदद की.

एशियन एथलेटिक्‍स चैंपियनशिप के अनुभव को याद करते हुए गोमती ने बताया, 'यदि तमिलनाडु सरकार मेरी मदद करती है तो मैं कड़ी मेहनत करूंगी और ओलंपिक मेडल जीतने की कोशिश करूंगी. अभी इस प्रतियोगिता में एक साल का वक्‍त बचा है. इस टूर्नामेंट के लिए काफी कम समय था और मैं चोट से वापसी कर रही थी इस वजह‍ से रेस के दौरान अपना सर्वश्रेष्‍ठ समय नहीं निकाल सकी.'उन्‍होंने कहा कि उन्‍हें हर कदम पर अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ा. सरकार ने मदद की होती तो अच्‍छा रहता. अब तमिलनाडु और भारत सरकार ने मदद की पेशकश की है.