सिमरन कंबोज; सुविधाओं के अभाव में भी छुई बुलंदियां

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कहते हैं कि मन में अगर कुछ करने का ठान लिया जाए तो रास्ते खुद बन जाते हैं। बड़ी से बड़ी चुनौती राह में बाधा नहीं बनती। संघर्ष कर सफलता मिलने का आनंद ही कुछ और होता है। जिद पर अड़ी रही। परिणाम यह हुआ उसने गांव का नाम राष्ट्रीय स्तर पर चमकाया। यह कहना है फतेहपुर निवासी रेस¨लग की राष्ट्रीय खिलाड़ी सिमरन कांबोज का। वह अपने अनुभव जागरण संवाददाता के साथ सांझे कर रही थी।

सिमरन कंबोज ने सुविधाओं के अभाव में अपने गांव का नाम राष्ट्रीय स्तर पर चमकाया। इन दिनों वह तन्मयता से अंतरराष्ट्रीय रेस¨लग की तैयारी में लगी हैं। इसकी अभी तारीख तय नहीं की गई।बीए पास कर चुकी सिमरन कहती हैं कि उनके पिता नहीं हैं। वे तीन बहने हैं। इन दिनों गांव के एक निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है। उसको बचपन से ही रेस¨लग का शौक था। वह शुरू से कुछ अलग करने की चाह रखती थी। यह खेल लड़कों का है। स्कूल समय से ही वह इसकी तैयारी करती थी। उसके शिक्षक उसको रोकते थे और लड़कियों के खेल खेलने की सलाह देते थे। उसको बुरा लगता था। वह अकेले में ही अभ्यास करती थी। इसके दांव पेंच सीखती थी। जब वह थोड़ी बड़ी हुई तो लोगों की सोच में कुछ बदलाव आया। उसने खेलना बंद नहीं किया।

जिद थी की वह गांव का नाम जिलास्तर पर ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर चमका कर ही दम लेगी। इतने बड़े स्तर की तैयारी करने के लिए उसको परेशानी आने लगी। गांव के लोग पहले ही विरोध करते थे। उसने हिम्मत नहीं हारी। हौसला रखते हुए तैयारी जारी रखी। उनकी मां एक मॉल में जॉब करती हैं। उन्होंने पूरा सहयोग किया। उनके सहयोग से तैयारी चलती रही। उसको नेशनल में खेलने के लिए मौका मिल गया। उसने 2012 में सोलन (हिमाचल प्रदेश) में आयोजित नेशनल प्रतियोगिता में भाग लेकर कांस्य पदक जीता था। इससे पूर्व वर्ष 2008 में गुरदासपुर में नेशनल स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लेकर कांस्य पदक हासिल किया। शुरू में जब उन्होंने खेलना शुरू किया, तो गांव के लोग विरोध करते थे। उसको खेलने से रेाकते थे। वह अपनी जिद पर थी। उसने किसी की परवाह नहीं की। पढ़ाई के साथ खेलों को जारी रखा। जब उसने जीतना शुरू किया तो जो लोग विरोध करते थे, वह उसका स्वागत करने लगे। उसने बीए कर लिया है। इन दिनों वह निजी स्कूल में पढ़ा रही हैं। साथ ही अंतरराष्ट्रीयस्तर पर भाग लेने के लिए तैयारी कर रही है। सिमरन बताती हैं कि उसकी बहन भी खेलों में भाग लेती है। उसके बाद गांव से और लड़कियों को भी खेलने का मौका मिला। ग्रामीणों की सोच बदली। वह लोग किसी लड़की को खेलने से रोकते नहीं है, उनका साथ देते हैं।