पेस-भूपति विवाद: पुरानी कहानी का नया अध्याय

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डेविस कप के पूर्व कप्तान आनंद अमृतराज को लगता है कि लिएंडर पेस और महेश भूपति के बीच कड़वे रिश्ता बयां करती ताजा घटना कोई नई नहीं है, लेकिन यह ‘पुरानी कहानी का नया अध्याय है।’ उन्होंने इसके लिए दोनों खिलाड़ियों को जिम्मेदार बताया। भूपति से पहले डेविस कप टीम के पूर्व गैर खिलाड़ी कप्तान ने कहा कि कप्तान को पेस को स्पष्ट कर देना चाहिए था कि वह अंतिम चार खिलाड़ियों में शामिल नहीं हैं और अगर पेस को खेलने वाली टीम में अपना स्थान सुनिश्चित करने का भरोसा नहीं था तो उन्हें बंगलूरू नहीं आना चाहिए था। 

पेस ने भूपति पर अपनी जगह का बेजां इस्तेमाल करने का आरोप लगाया और उन्हें टीम से बाहर कर दिया। जबकि गैर खिलाड़ी कप्तान ने कहा कि उन्होंने कभी भी उन्हें अंतिम चार में रखने का वादा नहीं किया था। और रिजर्व के तौर पर बंगलूरू नहीं आने का विकल्प भी दिया था। बकौल अमृतराज, ‘यह पुरानी कहानी का नया अध्याय है। यह दुखद है कि यह विवाद फिर से पैदा हुआ। इसमें दोनों पक्षों की गलती है। महेश ने इस निपटाने का गलत तरीका अपनाया। महेश ने लिएंडर को ईमेल क्यों नहीं भेजा और स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बताया कि आप अंतिम चार में हो। अगर दो महीने पहले ही उन्होने रोहन को खिलाने का फैसला कर लिया था तो तो इस खिलाड़ी (लिएंडर) को क्यों लटकाकर रखा जाए?’

साल 1999 के आस-पास शुरू हुआ यह वह झगड़़ा है, जो नियमित तौर पर सतह पर आता-जाता है। इस झगड़े के पीछे कई वजहें थीं। एक बड़ी वजह थी अहंकार की लड़ाई। महेश भूपति को हमेशा यह लगता रहा है कि लिएंडर पेस उन्हें कम आंकते हैं। यह सच है कि सिंगल्स में लिएंडर पेस की उपलब्धियां महेश भूपति के मुकाबले कहीं ज्यादा थीं, लेकिन डबल्स में जब दोनों ने बड़े खिताब जीते, तो उनमें दोनों का योगदान था। इसके अलावा, जब पेस और भूपति ने अलग होकर खेलना शुरू किया, तो अलग-अलग जोड़ीदार के साथ भी दोनों ने खिताब जीता। बावजूद इसके लड़ाई हमेशा बनी रही।

इस लड़ाई के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि टेनिस एसोसिएशन क्या कर रहा है? क्या एसोसिएशन के अधिकारियों के पास इतना अधिकार नहीं कि वे इन दोनों खिलाड़ियों को चेतावनी दें? बात अधिकार से ज्यादा इच्छाशक्ति की है। ये दोनों चाहे जितने बडे़ स्टार हों, वे खेल से बड़े नहीं हैं। टेनिस फेडरेशन के अधिकारी अब तक इस बात को दोनों खिलाड़ियों को समझाने में नाकाम रहे हैं। हम यह मान भी लें कि इन दोनों खिलाड़ियों के अनुभव और काबिलियत के आधार पर अभी इनका कोई विकल्प हमारे पास नहीं है, तो क्या भारतीय टेनिस हमेशा इनके आपसी मतभेद का शिकार बनता रहेगा? क्या भारतीय टेनिस हमेशा इसी माहौल में खेला जाएगा? क्या कभी किसी अधिकारी ने सोचा है कि इन दोनों की ‘तू-तू मैं-मैं’ से भविष्य के खिलाड़ियों में क्या संदेश जाएगा? जवाब तलाशने की बजाय अब तक होता यह आया है कि इन दोनों खिलाड़ियों की खींचतान में फेडरेशन के अधिकारी अपनी-अपनी सहूलियत और जरूरत के हिसाब से ‘घेराबंदी’ करते हैं। याद कीजिए साल 2012 के लंदन ओलंपिक से पहले की किचकिच।

महेश भूपति ने तब साफ कह दिया था कि वह डबल्स में लिएंडर पेस के साथ नहीं खेलेंगे। बाद में रोहन बोपन्ना ने भी पेस के साथ खेलने से इनकार कर दिया था। मेन्स डबल्स में पेस नहीं खेल पाए, इसलिए उन्हें महिलाओं के डबल्स मुकाबले में सानिया मिर्जा के साथ खेलने का मौका दिया गया। सानिया मिर्जा ने नाराज होकर कहा कि इन दोनों की लड़ाई में उन्हें ‘बलि का बकरा’ बनाया गया। फेडरेशन के अधिकारी इन खिलाड़ियों में सुलह कराने के लिए बाकायदा लंदन भेजे गए। इन सारी घटनाओं को याद कराने का मकसद यह था कि हम लंदन ओलंपिक्स से टेनिस में खाली हाथ वापस लौटे थे। इसके बाद भी किसी ने सबक नहीं लिया।

यह भी मान लिया जाए कि हमारे खिलाड़ी जो मुकाबले हारे, उसके पीछे इस विवाद का कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी यह एक गंभीर बात है कि भारतीय टेनिस इतिहास के दो दिग्गज खिलाड़ी खेल का फायदा-नुकसान सोचे बिना आपस में लड़े जा रहे हैं। ऐसे में, दोनों ही दिग्गज खिलाड़ियों को यह कड़ा संदेश देने की जरूरत है कि अगर इनके अहं की लडाई में यूं ही टेनिस का नुकसान होता रहा, तो यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भारतीय टेनिस को इन दोनों खिलाड़ियों से आगे निकलना होगा। अगर 20 साल से मामला नहीं सुलझ रहा है, तो गलतियां दोनों तरफ से हुई होंगी, लेकिन उन गलतियों की सजा खेल क्यों भुगते? अगर भारतीय टेनिस संघ के अधिकारी दोनों खिलाड़ियों के बीच के इस विवाद को नहीं सुलझा पा रहे, तो उन्हें भी हटाया जाना चाहिए। जरूरत पड़े तो खेल मंत्रालय को हस्तक्षेप करना चाहिए, लेकिन पराकाष्ठा पर पहुंच चुके इस विवाद से खेलप्रेमियों को निजात चाहिए।